शहर के समस्त कृष्ण मंदिरों से ठाकुर जी के चल विग्रह को मंदिर चौक पर विराजमान कराकर शरद चंद्र की धवल चांदनी में स्नान कराया गया. पौराणिक परम्परा और मान्यता अनुसार शरद पूर्णिमा को चंद्रमा सोलह कलाओं से परिपूर्ण होते हैं और रात में अमृत वर्षा होती है. इसी वजह से ठाकुरजी के चल विग्रह को सफेद पोशाक पहना कर विशेष श्रृंगार कर निज मंदिर से बाहर चौक पर विराजित किया जाता है और संकीर्तन का आयोजन होता है. इस दिन ठाकुर के चिपड़ा, सेलडी, पतासे के साथ ही खीर-खाजे का भोग लगाया जाता है.
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